रश्मि डी. जैन नई दिल्ली की कविता “तन्हा दिल.. तन्हा सफर”

रश्मि डी जैन

मै कल भी तन्हा थी
और आज फिर से उसी
मोड़ पर खड़ी हूं
जिंदगी के सफर में ना जाने
कितने रिश्ते मिले और छूट गए
कितने दोस्त मिले और बिछड़ गए
जिस राह पे चली थी आज
एक बार फिर से वही आ गई हूं
जहाँ कोई नज़र आता नही
दूर दूर तक सुनसान राहें
डर भी लगता है कभी कभी
कैसे कटे गा ये सफ़र
ये सुनसान डगर
कभी मन्ज़िल मिलेगी भी या नहीँ
कोई हमसफ़र ना रहा
न मंजिल है न ठिकाना
बस चलते ही है जाना
सब छूटते जा रहे है ऐसे
मुठी से रेत जैसे
दिल ज़ार ज़ार रोता है
पुरानी यादें जब परेशां करती हैँ
कैसे भुला दुं उन हसीं यादों को
टूट रही हूं बिखर रही हूं
कैसे समेटूं खुद को
नहीँ जानती
जिस पर भरोसा किया
उसी ने मान ना रखा मेरे भरोसे का
पल भर मेँ चकनाचूर कर दिया
बिना किसी मकसद के जीना
कितना बेमानी लगता है
रंगहीन लगती है दुनियां
कितना कठिन है
अकेले सफर करना
किसे बताये अपनी मनोस्थिति
कुछ कहना भी
उचित ना होगा किसी से
क्यूंकि कोई मुझे समझकर भी
समझना नही चाहता
“खुद को धोखा……
………दिए जाते है हम
जाने किस भ्रम में…….
……….जिए जाते है हम
जबकि मालूम है…….
……….कितना अकेले है
फिर भी सबको…….
……अपना बताते है हम”

रश्मि डी जैन

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