प्रदोष व्रत की पूजा विधि

रजनी खेतान 
इंदौर

प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा की जाती है| यह व्रत निर्जल अर्थात् बिना पानी के किया जाता है | त्रयोदशी के दिन, पूरे दिन व्रत करके प्रदोष काल मे स्नान आदि कर साफ़ सफेद रंग के वस्त्र पहन कर पूर्व दिशा में मुह कर भगवान की पूजा की जाती है|
सबसे पहले दीपक जलाकर उसका पूजन करें।
सर्वपूज्य भगवान गणेश का पूजन करें|
तदुपरान्त शिव जी की प्रतिमा को जल, दूध, पंचामृत से स्नानादि कराए | बिलपत्र, पुष्प , पूजा सामग्री से पूजन कर भोग लगाएं। कथा कर आरती करें।

प्रदोष व्रत की कथा
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प्राचीन काल में एक गरीब पुजारी हुआ करता था| उस पुजारी की मृत्यु के बाद, उसकी विधवा पत्नी अपने पुत्र को लेकर भरण-पोषण के लिए भीख मांगते हुए, शाम तक घर वापस आती थी| एक दिन उसकी मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हुई जो कि अपने पिता की मृत्यु के बाद दर-दर भटकने लगा था| उसकी यह हालत पुजारी की पत्नी से देखी नही गई, वह उस राजकुमार को अपने साथ अपने घर ले आई और पुत्र जैसा रखने लगी|

एक दिन पुजारी की पत्नी अपने साथ दोनों पुत्रों को शांडिल्य ऋषि के आश्रम ले गई | वहा उसने ऋषि से शिव जी के इस प्रदोष व्रत की कथा व विधी सुनी , घर जाकर अब वह प्रदोष व्रत करने लगी | दोनों बालक वन में घूम रहे थे, उसमे से पुजारी का बेटा तो घर लौट गया, परन्तु राजकुमार वन में ही रहा | उस राजकुमार ने गन्धर्व कन्याओ को क्रीडा करते हुए देख, उनसे बात करने लगा | उस कन्या का नाम अंशुमती था | उस दिन वह राजकुमार घर भी देरी से लौटा|

दूसरे दिन फिर से राजकुमार उसी जगह पंहुचा, जहाँ अंशुमती अपने माता-पिता से बात कर रही थी| तभी अंशुमती के माता-पिता ने उस राजकुमार को पहचान लिया तथा उससे कहा की आप तो विदर्भ नगर के राजकुमार हो ना, आपका नाम धर्मगुप्त है| अंशुमती के माता-पिता को वह राजकुमार पसंद आया और उन्होंने कहा कि शिव जी की कृपा से हम अपनी पुत्री का विवाह आपसे करना चाहते है , क्या आप इस विवाह के लिए तैयार है?

राजकुमार ने अपनी स्वीकृति दी और उन दोनों का विवाह संपन्न हुआ| बाद में राजकुमार ने गन्धर्व की विशाल सेना के साथ विदर्भ पर हमला किया और घमासान युद्ध कर विजय प्राप्त की तथा पत्नी के साथ राज्य करने लगे| वहा उस महल में वह उस पुजारी की पत्नी और पुत्र को आदर के साथ ले जाकर रखने लगे | उनके सभी दुःख व दरिद्रता दूर हो गई और सुख से जीवन व्यतीत करने लगे|

एक दिन अंशुमती ने राजकुमार से इन सभी बातो के पीछे का रहस्य पूछा | तब राजकुमार ने अंशुमती को अपने जीवन की पूरी बात और प्रदोष व्रत का महत्व और प्रदोष व्रत से प्राप्त फल से अवगत कराया|
उसी दिन से समाज में प्रदोष व्रत की प्रतिष्ठा व महत्व बढ़ गया तथा मान्यतानुसार लोग यह व्रत करने लगे|

कैसे करें प्रदोष व्रत का उद्यापन
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त्रयोदशी के दिन स्नानादि करके , साफ़ व कोरे वस्त्र पहनें।
रंगीन वस्त्रों से भगवान की चौकी को सजाएं।
उस चौकी पर प्रथम पूज्य भगवान गणेशजी की प्रतिमा रख, शिव-पार्वती की प्रतिमा रखे और विधी विधान से पूजा करे|
पूजा ममें नैवेद्य लगा कर हवन भी करें|
प्रदोष व्रत के हवन में पुराणों के अनुसार दिये मंत्र ॐ उमा सहित-शिवाये नम: का कम से कम 108, अधिक से अधिक अपनी श्रध्दा के अनुसार आहुति दें।
तदुपरान्त पूरे भक्तिभाव से आरती करें |
पुरोहित को भोजन करा कर दान दे, अन्त में पूरे परिवार के साथ भगवान शिव और पुरोहितों का आशीर्वाद लेकर प्रसादी ग्रहण करें।

 

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